www.manojbhawuk.com

जुलाई 28, 2007

Welcome to Manoj Bhawuk’s Own Website!

Bhojpuri Poet, Writer, and Film-critic.

जनवरी 17, 2007

फागुन के उत्पात  :  भइल गुलाबी गाल

हई ना देखs ए सखी फागुन के उत्पात ।

दिनवो लागे आजकल पिया-मिलन के रात ॥1॥

अमरइया के गंध आ कोयलिया के तान ।

दइया रे दइया बुला लेइये लीही जान ॥2॥

ठूठों में फूटे कली, अइसन आइल जोश ।

अब एह आलम में भला, केकरा होई होश ॥3॥

महुआ चुअत पेड़ बा अउर नशीला गंध ।

भावुक  अब टुटबे करी, संयम के अनुबंध ॥4॥ 

बाहर-बाहर हरियरी, भीतर-भीतर रेह ।

जले बिरह के आग में गोरी-गोरी देह ॥5॥

भावुक हो तोहरा बिना कइसन ई मधुमास।

हँसी-खुशी सब बन गइल बलुरेती के प्यास ॥6॥

हमरो के डसिये गइल ई फागुन के नाग।

अब जहरीला देह में लहरे लागल आग ॥7॥

मन महुआ के पेड़ आ तन पलाश के फूल ।

गोरिया हो एह रूप के कइसे जाईं भूल ॥8॥

हँसे कुंआरी मंजरी भावुक डाले-डाल ।

बिना रंग-गुलाल के भइल गुलाबी गाल॥9॥

जब-जब आवे गाँव में ई बउराइल फाग।

थिरके हमरा होठ पर अजब-गजब के राग॥10॥

कोयलिया जब-जब रटे काम-तंत्र के जाप।

तब-तब हमरो माथ पर चढ़िये जाला पाप ॥11॥

मादकता ले बाग में जब वसंत आ जाय।

कांच टिकोरा देख के मन-तोता ललचाय ॥12॥

तन के बुझे पियास पर मन ई कहाँ अघाय।

ई ससुरा जेतने पिये ओतने ई बउराय ॥13॥

गड़ी,छुहाड़ा,गोझिया भा रसगुल्ला तीन।

के तोहसे बा रसभरल, के तोहसे नमकीन॥14॥

चढ़ल ना कवनो रंग फिर जब से चढ़ल तोहार।

भावुक कइसन रंग में रंगलs अंग हमार॥15॥

आग लगे एह फाग के जे लहकावे आग ।

पिया बसल परदेश में, भाग कोयलिया भाग॥16॥

लहुरा देवर घात में ले के रंग-गुलाल।

भउजी खिड़की पे खड़ा देखें सगरी हाल॥17॥

अंगना में बाटे मचल भावुक हो हुड़दंग।

सब के सब लेके भिड़ल भर-भर बल्टी रंग॥18॥

साली मोर बनारसी, होठे लाली पान।

फागुन में अइसन लगे जस बदरी में चान॥19॥

 कबो चिकोटी काट के जे सहलावे माथ । कहाँ गइल ऊ कहाँ गइल, मेंहदी वाला हाथ॥20॥

 फागुन में आवे बहुत निर्मोही के याद ।

पागल होके मन करे खुद से खुद संवाद॥21॥

माघ रजाई में रहे जइसे मन में लाज ।

फागुन अइसन बेहया थिरके सकल समाज॥22॥

कींचड़-कांदों गांव के सब फागुन में साफ।

मिटे हिया के मैल भी, ना पूरा त हाफ॥23॥

महुए पर उतरल सदा चाहे आदि या अंत।

जिनिगी के बागान में उतरे कबो वसंत ।।24॥

के बाटे अनुकूल आ के बाटे प्रतिकूल।

ई कहवाँ सोचे कबो उड़त फागुनी धूल॥25॥

फागुन के हलचल मचल खिलल देह  के फूल।

मन-भौंरा व्याकुल भइल, कर ना जाये भूल॥26॥

झुक-झुक के चुम्बन करे बनिहारिन के गाल।

एतना लदरल खेत में जौ-गेहूं के बाल॥27॥

एतना उड़ल गुलाल कि भउजी लाले-लाल।

भइया के कुर्ता बनल, फट-फुट के रूमाल॥28॥

मह-मह महके रात-दिन पिया मिलन के याद।

भीतर ले उकसा गइल, फागुन के जल्लाद॥29॥

भावुक तू कहले रहS आइब सावन बाद।

 फगुओ आके चल गइल, ना चिट्ठी,संवाद॥30॥ 

भावुक के दोहे

अक्टूबर 2, 2006

    

      जिनगी रोज सवाल

एगो से निपटीं तले, दोसर उठे बवाल ।

केहू कतनो हल करी, ‘जिनिगी रोज सवाल’ ॥1॥

जिनिगी के दालान में का-का बा सामान ।

ख्वाब,पंख,कइंची अउर लोर-पीर मुस्कान  ॥2॥

पाँख खुले त·  आँख ना, आँख खुले त·  पाँख।

एही से अक्सर इहाँ, सपना होला राख ॥3॥

रिस्ता-नाता, नेह सब, मौसम के अनुकूल ।

कबो आँख के किरकिरी, कबो आँख के फूल ॥4॥

‘भावुक’ अब बाटे कहाँ, पहिले जस हालात।

हमरा उनका होत बा, बस बाते भर बात ॥5॥

उनके के सब पूछ रहल, धन बा जिनका पास ।

हमरा छूछे भाव के, के डाली अब घास ॥6॥

पर्वत से निकलल नदी, लेके मीठा धार ।

बाकिर जब जग से मिलल, भइल उ खारे-खार ॥7॥

अब के आई पास में, पेंड़ भइल अब ठूँठ ।

‘भावुक’ दुनिया मतलबी, रिस्ता-नाता झूठ ॥8॥

हमरा कवना बात के, होई भला गरूर ।

ना पद, ना धन, ज्ञान बा, ना कुछ लूर-सहूर ॥9॥

तहरा से केतना लड़ीं, जब तू रहल· पास ।

बाकिर अब तहरे बिना, मन बा रहत उदास॥10॥

चढ़त उम्र के धूप बा, जियरा बा छपिटात ।

‘भावुक’ दहकत साँस अब ढ़ोअल नइखे जात ॥11॥

हमरा से ना हो सकल झूठ-मूठ के छाव ।

चेहरा पर हरदम रहल, आंतर के हीं भाव ॥12॥

छलक-छलक बहते रहल, पलक-पलक से नीर ।

तबहू हलुका ना भइल ‘भावुक’ मन के पीर ॥13॥

नोच रहल बाटे उहे, राउर रोआँ- पाँख ।

जेकरा के दीहनी कबो, रउरा आपन आँख ॥14॥

घुट-घुट के कइसन जियल ‘भावुक’ सुबहो-शाम ।

दुनिया में बाटे बहुत , जीये के पैगाम ॥15॥

कतहूँ असरा ना मिलल, पेड़ भइल जब  ठूँठ ।

पड़ल गिलहरी सोच में, दुनिया अतना झूठ ॥16॥

अपने मत धूनल करीं ,चलीं समय के साथ ।

बेटो  से पूछल करीं ,ओकरा मन के बात ॥17॥

जहवाँ बेटा-बाप ना ,बइठे कबहूँ साथ ।

ओइसन घर के घर कहीं , कइसे ए रघुनाथ ॥19॥

जवना घर के मालिके, अनपढ़ , मूर्ख, गँवार ।

ओह घर के हम का कहीं, राम लगइहें पार ॥20॥

‘भावुक’ जो बाटे इहे, किस्मत के मंजूर ।

भरल आम के बाग में, तहरा मिली धतूर ॥21॥

मौत से आगे सोंच के, थाम्हीं जे पतवार ।

हँसी-खुशी से जी सकी , उहे ए सरकार ॥22॥

कबहूँ-कबहूँ गम इहाँ धरे खुशी के रूप ।

एह से मुश्किल बा, कहल, छाया ह· कि धूप ॥23॥

फूल बनी, काँटा बनी, बात हिया में जात ।

शब्द-शब्द पर सोच के, रखिह आपन बात ॥24॥

‘भावुक’ जब तक ना चुभे, दिल में कवनो तीर ।

कागज पर उतरे  कहाँ ठीक-ठाक तस्वीर ॥25॥

दुनिया से बा जे  मिलल , हँसी-खुशी आ घात ।

सौंप रहल बानी उहे, दोहा में सौगात ॥26॥

बुढ़वा बरगद देख के , मन में आइल भाव ।

माथ रहे आकाश में अउर जमीं में पाँव ॥ 27॥

हियरा से हियरा मिलल, मिलल नैन से नैन ।

ख्वाब भइल पूरा मगर, गइल आँख से रैन ॥28॥

पढ़ के मत अइसे रख·, जस बासी अखबार ।

खत में दिल के बात बा, कुछ त सोच· यार ॥29॥

जिनिगी एगो राग ह· , खुल के गाईं गीत ।

का मालूम कब टूट जाय, सांसन के संगीत ॥30॥

bhawuk3.jpg

मीरा, तुलसी, जायसी, भावुक, सूर , कबीर ।

खींच सकल केहू कहाँ, जिनिगी के तस्वीर ॥31॥

पइसे माई-बाप बा, पइसे बा भगवान ।

पइसा सब पर छा गइल, धर्म-कर्म-ईमान ॥32॥

मनीआर्डर के आस में, चूल्हा परल उपास ।

‘भावुक’ तहरा देश के, केतना भइल विकास ॥33॥

पान-फूल से हम मिलब, भीतर से मुस्कात ।

आईं हमरो द्वार पर,मत देखीं औकत ॥34॥

टूट गइल संबंध त·, राउर कवन कसूर ।

पतझड़ में पतई सदा , रहे पेड़ से दूर ॥35॥

जिये-मरे के शर्त पर , करत रही जे काम ।

मंजिल तक जाई उहे, ऊहे दी परिणाम ॥36॥

‘भावुक’ जेकरा पास बा, चौबीस घंटा काम ।

ओकरा ना लागे कबो, जाड़ा, गरमी, घाम ॥37॥

प्यास बुताइल ना कबो, धवनी मीलो-मील ।

जहवाँ भी गइनी उहाँ, मिलल रेत के झील ॥38॥

भरल खजाना आस के, बाटे जेकरा पास ।

उहे बा सबसे धनी, ऊहे बा बिन्दास ॥39॥

पड़ल हवेली गाँव में ‘भावुक’ बा सुनसान ।

लइका खोजे शहर में, छोटी मुकी मकान ॥40॥

मरल आस- विश्वास जो अउर गइल मन हार ।

तब बूझीं जे आदमी, भरलो-पुरल भिखार ॥41॥

परदेसी ‘भावुक’ पिया, रोजे करिह· भेंट ।

हमहूँ इंटरनेट पर , तूहूँ इंटरनेट ॥42॥

पढ़े बदे छूटल रहे ,कबहूँ आपन देश ।

अब धंधा-पानी बदे , चलनी फिर परदेश ॥43॥

रोजे रास्ता बदले के जेकरा बाटे रोग ।

धोबी के कुत्ता बने, अक्सर ऊहे लोग ॥44॥

मूक साधना में बहुत , ताकत होला मीत ।

भीड़-भाड़ से तू अलग, रहि के गाव· गीत ॥45॥

bhawuk2.jpg

बड़-बुजुर्ग कहलें जहाँ, देखल हवे गुनाह ।

‘भावुक’ हो मन ले गइल , उहवें रोज निगाह ॥46॥

‘भावुक’ जे ना हो सकल , ओकर का अफसोस ।

कवना-कवना बात के , लेब· माथे दोष ॥47॥

माई रे जाई कहाँ , देवता पूजल तोर ।

कहियो त होइबे करी, हमरो खातिर भोर ॥48॥

मारे के बा बाज के, पीटत बानी ढोल ।

गौरइयन के झुंड पर, दागत बानी गोल ॥49॥

भाला लेके भोंक रहल बा जे बारम्बार ।

ओहू दुश्मन के पुजे, भारत के सरकार ॥50॥

दुनिया चाहे जे कहे , सभकर खींचे ध्यान ।

चंचल, अल्हड़ देह आ, मधुर-मधुर मुस्कान ॥51॥

हमरा मन मे बा उठल तहरे काहे चाह ।

दिल मे अपना सोच के फेर· तनी निगाह ॥52॥

चलनी मे पानी भरत, बीतल उम्र तमाम ।

तबहूँ बा मन मे भरम, कइनी बहुते काम ॥53॥

‘भावुक’ दोहा बन कर· ,बहुते बीतल रात ।

जइब· ना  आफिस अगर, खइब· कइसे भात ॥54॥

लम्बा दूरी तय करे ‘भावुक’ पातर धार ।

फइलत-पसरत जे चले, से कब पहुंचे पार ॥55॥

धुआँ उठे आकाश मे खुद जरला के बाद ।

‘भावुक’ तुहूँ जार द· ,मन के सब अवसाद ॥56॥

जिनिगी के हालात के, इहो एगो रूप ।

अँगना मे सावन मगर दुअरा बरिसे धूप ॥57॥

अँगना गायब हो गइळ, बुढ़िया खोजे घाम ।

अपना-अपना रूम में सभका बाटे काम ॥58॥

दिन बीतल जे घाम में ओकर फिक्र फिजूल ।

खाली छाया में खिले कहवाँ कवनो फूल ॥59॥

दुनिया से जब-जब मिलल,ठोकर आ दुत्कार ।

तब-तब बहुते मन परल, माई तोर दुलार ॥60॥

bhawuk4.jpg

भागत गाछ-बिरीछ बा, अउर खड़ा बा रेल । 

‘भावुक’ अक्सर आँख से , ईहे लउके खेल ॥61॥

‘भावुक’ तोहरा साथ में, केतना भइल अनेत ।

चिरूआ भर पानी मिलल, ओहू में बा रेत ॥62॥

मन के भीतर चाह के, धधकत बाटे धाह ।

मंजिल लउकत बा, मगर नइखे लउकत राह ॥63॥

भीतर-भीतर खोखला, बाहर से आबाद ।

‘भावुक’ चक्कर नाम के, कर देला बरबाद ॥64॥

जवना गाछी पर फरे, ‘भावुक’ मिठका आम ।

तवने पर ढेला चले , दुपहर, सुबहो शाम ॥65॥

जाने कइसन आज ई , फइलल जाता रोग ।

अनके सुख से बा दुखी , ‘भावुक’ सगरी लोग ॥66॥

हमरा हालत पर हँसे, हमरे अब तस्वीर ।

‘भावुक’ कइसन मोड़ पर, ले आइल  तकदीर ॥67॥

ऋतु बसंत के बा इहाँ, बस छन भर अवकात ।

जिनिगी-भर साथे रहे बस खाली बरसात ॥68॥

जहवाँ हम रोपले रहीं किसिम-किसिम के फूल ।

समय उगा के चल गइल, उहवें आज बबूल ॥69॥

‘भावुक’ एगो घर बदे ,छछनत रहल परान ।

बाकिर, कहवाँ घर बनल, भलहीं बनल मकान ॥70॥

साँस-साँस में भूख बा, साँस- साँस में प्यास ।

तब कइसे ई मन भरी, जबले बाटे साँस ॥71॥

‘भावुक’  हमरा पास बा , बावन बिगहा खेत ।

बाकिर कवना काम के , जब सब रेते- रेत ॥72॥

अरमानन के भीड़ बा , बाकिर दिल बा छोट ।

एही से अक्सर इहाँ , दिल में लगे कचोट ॥73॥

चलते-चलते राह में, आवे अइसन मोड़ ।

जहवाँ आपन साँस भी, देला संगत छोड़ ॥74॥

हमरा ई का हो गइल, ‘भावुक’  तहरा जात ।

तहरे रट, तहरे फिकिर , तहरे खाली बात ॥75॥

 HOME

Follow

Get every new post delivered to your Inbox.